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Messenger of Legal Knowledge -Memoirs – Events-Views and Expressions

Messenger of Legal Knowledge एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने अपने दृढ़ निष्चय, कर्त्तव्य निष्टा और चारित्रिक बलके आधार पर जीवन के कठिन संग्राम में विजय पाई। जिसने जीवन-यापन के लिए साधन जुटाने मात्र को ही जीवन का ध्येय नहीं माना। जिसने समाज, धर्म और देश के लिए आवश्यकतानुसार तन, मन, धन से, समर्पण भाव से, कार्य किया। जिसने कभी भी धनोपार्जन के लिए, पद लाभ के लिए या यशॉकामना के लिए प्रेरित होकर कोई कार्य नहीं किया। जिसने अपने जीवन का दीप जलाकर भविष्य की पीढ़ी का मार्ग आलोकित किया।

श्री मदनगोपालजी का जन्म पंजाब के एक छोटे से गांव में हुआ था। यह गांव विभाजन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान का अंग बन गया। विभाजन की त्रासदी में इनके परिवार को भय के वातावरण में कश्ट सहते हुए अपनी जमा पूंजी खोकर भारत आना पड़ा। यहां शारणार्थि शिविर में एक भयंकर विपदा आ गई। मदनजी के पिता और पितामह दोनों का स्वर्गवास हो गया। शिविर में किशौरवय मदन ने देखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता कैसी आत्मीयता से निःस्वार्थ भाव से सहायता कर रहे है। इसी समय उनका संघ से संपर्क हुआ जो आज तक बना हुआ है। 1948 में उन्होंने संघ पर अनुचित प्रतिबंध के विरूद्ध सत्याग्रह में भाग लिया।

युवावस्था में पदार्पण करते ही मदनजी के कंधों पर परिवार के पालन-पोषण का भार आ गया। उन्होंने इलाहाबाद के एक विधि साहित्य के प्रकाशक संस्थान में सेल्समेन की नौकरी कर ली। वहां अपनी लगन, कार्यकुशलता और परिश्रम से सफलता तो पाई ही यह विश्वास भी अर्जित कर लिया कि मैं स्वतंत्र रूप से पुस्तक विक्रेता का काम कर सकता हूँ। जब संविधान के लागू होने पर दिल्ली में नए न्यायालयों की स्थापना हुई तो मदनजी दिल्ली आ गए। 1956 में दिल्ली में कार्य का प्रथम पग रखा और तीन वर्ष में ही गोखले मार्ग पर पुस्तकों की ऐसी दुकान खड़ी कर दी जिसका नाम कुछ ही वर्षो में समस्त भारत जान गया। उनकी यात्रा में एक मोड़ तब आया जब उन्होंने प्रकाशन के क्षेत्र मे कदम रखा। इतना ही नहीं विधि-विद्यालयों में प्रवेष परीक्षा के लिए तैयारी कराने वाली अग्रणी संस्था को भी मदनजी ने ही जन्म दिया।

किंतु यह उपलब्धियां इनके परिचय के लिए अपर्याप्त है। प्रारंभ से ही मदनजी को ग्राहक अच्छे लगते थे। ग्राहक आज भी उनके लिए सर्वाधिक आदरणीय व्यक्ति है। ग्राहको से उनका अमिट नाता बन जाता है। उनके ग्राहक कुछ ही समय में उनके मित्र बन जाते हैं। वे चाहे मुख्य न्यायमूर्ति हो या ज्येश्ठ अधिवक्ता हो या भारत के राष्ट्रपति ही क्यों न हो सब उन्हें अपना लेते है, स्नेह और सम्मान देते है। इस सूची में कुछ प्रमुख नाम हैः-

नानी पालखीवाला, मोतीलाल सीतलवाड़, एम.सी.छागला, न्या. हिदायतुल्ला, सी.के.दफ्तरी, बैरिस्टर एन.सी. चटर्जी, न्या. एच.आर. खन्ना, फाली नारीमन, एच.एम. सीरवई, डा. दुर्गादास बसु, श्री वी.के.एस. चैधरी, फ्रेंक एन्थोनी, श्री अशोक देसाई आदि। इन नामों की सूची बहुत लंबी है।

इनके संस्मरणों में कुछ विशिष्ट लोगों की विशेष बातों से परिचय होता है। श्री गोपालस्वरूप पाठक (पूर्व उपराष्ट्रपति) के घर में पहली मंजिल में मां आनंदमयी ठहरती थीं इसलिए कोई भी किसी समय जूते पहनकर वहीं नहीं जा सकता था। वह स्थान मंदिर के समान था।

कैप्टन प्रेमकुमार सहगल जो नेताजी सुषश बोस को इंडियन नेशनल आर्मी में थे, न्या. अछरूराम के सुपुत्र थे। एम.सी. सीतलवाड पहले महान्यायवादी थे और 12 वर्ष तक अपने पद पर रहे। वे सुप्रीम कोर्ट बार के पहले अध्यक्ष थे और 18 वर्ष तक इस पद पर रहे। भारत के विधि आयोग के भी वे पहले अध्यक्ष थे। सीरवई की पुस्तक के चैथे संस्करण की पहली जिल्द 1991 में प्रकाषित हुई। सीरवई को चैथे संस्करण को तैयार करने में सात वर्श का समय लगा। इस बीच उन्होंने विधि व्यवसाय पूरी तरह बंद कर दिया था। चैथा संस्करण तीन जिल्दों में है जिसमें लगभग 3000 पृश्ठ है। तीसरे खंड का अंतिम प्रूफ उन्होंने 25 जनवरी 1996 को लौटाया और दूसरे ही दिन संसार से विदा लेे ली। राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी की निर्वाचन अर्जी में न्या. जगमोहन लाल सिन्हा ने निर्णय दिया था। निर्णय को गुप्त रखने के लिए उन्होंने निश्कर्श वाले अंतिम भाग को अपने हाथ से रेमिंग्टन टाइपराइटर पर टाइप किया था। एच.आर. गोखले के पिता और पितामह दोनों बड़ोदा हाइकोर्ट के न्यायाधीश थे। वे स्वयं मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे और उनकी पुत्री सुनंदा मंडारे दिल्ली न्यायलय की न्यायाधीश रहीं। चार पीढ़ियां न्यायाधीष रहीं।

इतने दीर्घकालीन जीवन में मदनजी का प्रकाषकों से, अधिवक्ताओं से, न्यायाधीषों से, विद्यार्थियों से अन्य पुस्तक वितरकों और विक्रेतओं से संबंध बना। इनमें से कुछ तो ऐसे रहे होंगे जिनका व्यवहार उचित या स्तरीय नहीं रहा होगा। किंतु पूरी पुस्तक में एक भी वाकय, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है जहां उन्होंने किसी के विशय में कुछ टिप्पणी की हो या उसकी कुछ कमी या दोश दिखाया हो। मदनजी ऐसे अद्भुत व्यक्ति हैं कि उन्हें सदा दूसरों के गुण ही दिखाई देते हैं दोश नहीं। यह उनका स्वभावजन्य गुण है किंतु इसमें संघ के सानिध्य और संस्कार से वृद्धि हुई है।

श्री मा.स. गोलवलकर ‘गुरूजी’ 1940 से 1973 तक संघ में शीर्षस्थ थे। उनके भाशणों में या बातचीत में कभी किसी की निंदा नहीं होती थी। उनके भाशणों का संग्रह 12 जिल्दों में है। कहीं भी किसी व्यक्ति के दोश दिखाने का प्रयास नहीं है। संघ का प्रयास गुणों का विकास करना रहता है। परनिंदा नहीं। मदनजी की लेखनी और उनके जीवन में भी यही गुण परिलक्षित होता है।

मदनजी की ऊपर की पीढ़ी उन्हें असमय में असहाय अवस्था में छोड़ गई। मदनजी ने अपने परिश्रम और प्रयास से अपने जीवन को संवारा। किन्तु प्रभु की कृपा से उनके बाद की पीढ़ी ने उन्हें स्नेह के साथ साथ सहयोग भी प्रभूत मात्रा में दिया है। 1975 में जब वे आपातकाल में बंदी बना लिए गए तो उनके ज्येश्ठ पुत्र ने कार्य संभाल लिया। आज तीनों पुत्र परस्पर सौहार्द रखते हुए अपनी योग्यता और विषेशता से ‘यूनिवर्सल’ को आगे बढ़ा रहे है।

यह मेरा सौभाग्य है कि मदनजी मरे मित्र है। प्रभु से कामना करता हूं कि वे शतायु हों और जैसाकि वेदों में कामना की गई है कि षत वर्श उनकी सभी इन्द्रियां अपना अपना कार्य करती रहें।

ब्रज़किशोर शर्मा *


*Former Chairman, Copyright Board & National Book Trust; Retd. Additional Secretary Ministry of Law, Govt. of Inida; Chairman, Raja Rammohun Roy Library Foundation, Ministry of Culture, Govt. of India.

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